Saturday, 18 January 2014

स्वप्न

देखते जब स्वप्न
केवल अपने लिये
रह जाता बनके 
केवल एक स्वप्न।

मिल कर साथ
देखते जो स्वप्न 
सब के लिये,
उतर आता वह 
बन कर 
एक सम्पूर्ण सत्य।

देखो एक स्वप्न
लेकर सब को साथ।

....कैलाश शर्मा

17 comments:

  1. सब साथ हों तो स्‍वप्‍न की जरूरतें कम हो जाएंगी।

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  2. पहले सब के साथ मिलकर सपने बनायेंगे
    फिर साथ मिलकर सपने में सपने देखने जायेंगे :)

    बहुत सुंदर !

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    1. सुन्दर सन्देश !! आभार

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  3. स्वप्न ही स्वप्न न बन जाए कही .......सुन्दर विचार ....

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  4. काफी उम्दा प्रस्तुति.....
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (19-01-2014) को "तलाश एक कोने की...रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1497" पर भी रहेगी...!!!
    - मिश्रा राहुल

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  5. बहुत सुन्दर , स्वप्न ऐसा जो समावेशी हो तो फिर क्या कहने ..

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  6. सच कहा है ... सब के साथ मिलके देखा स्वप्न सब की ताकत से पूरा होता है ... एक और एक ग्यारह हो जाते हैं तब ...

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  7. बहुत खूब..सुंदर रचना
    हिमकर श्याम
    http://himkarshyam.blogspot.in/

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  8. सपने तो सपने हैं ...उनका क्या

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