Tuesday, 15 September 2015

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (नौंवी कड़ी)

                                      द्वितीय अध्याय (२.२१-२.२५)
                                             (with English connotation)
है आश्चर्य भीड़ में जग की, नहीं दूसरा दिखता मुझ को|
जग लगता हो जंगल जैसा, होगा किससे मोह है मुझ को||(२.२१)

I am amazed that I do not see duality even in
crowd. The world appears desolate to me. Then
how can I have attachment with anyone. (2.21)

न शरीर मैं जो जड़ होता , और न है यह शरीर ही मेरा|
जीव नहीं, चैतन्य हूँ मैं तो, जीने की इच्छा बंधन है मेरा||(२.२२)

Neither I am body, nor this body is mine. I am
pure Consciousness. My craving or desire to
live is my only bondage. (2.22)

जैसे वायु वेग के कारण, लहरें उठती अनंत  सागर में|
वैसे ही मेरी चित्त वृत्ति से, उठती लहरें अंतस सागर में||(२.२३)

King Janak says that as due to winds the
waves arise in the ocean and subsidise
when the winds calm down, similarly in the  
infinite ocean of myself, due to the mental
winds, many waves of surprising world
arise in my consciousness. (2.23)

जब अंतस अनंत सागर में, चित्तवायु शांत हो जाती|
जीव वणिक शरीर नौका है, क्षय अभाग्यवस हो जाती||(२.२४)   

When in the infinite ocean of myself, the mental
winds subsidise, the body boat of the living-being
trader is destroyed unfortunately. Here the Self
is compared with the ocean, the mental activities
with the winds, the body with the boat, the living-
being with the trader. (2.24)

मेरे अंतस अनंत सागर में, जीवन रूपी लहरें उठ जातीं| 
मिलकर और खेलकर लहरें, हैं मुझमें ही हो लय जातीं||(२.२५)

It is surprising that in the infinite ocean of myself,
the waves of life arise, meet, play and ultimately
subsidise in me according to their nature. (2.25)

                द्वितीय अध्याय समाप्त

                                     ....क्रमशः

....©कैलाश शर्मा


12 comments:

  1. वाह ! बेहद सुन्दर अनुवाद।

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  2. वाह ! बेहद सुन्दर अनुवाद।

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  4. एक कठिन विषय पर सहज अभिव्यक्ति, इस पदानुवाद पर कोटिश बधाई, आदरणीय कैलाश शर्माजी

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  5. बहुत सुन्दर सरल भाव पद्यानुवाद के लिए आभार!

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  6. अत्यंत सरस, सहज एवं सरल अनुवाद ! बहुत सुन्दर !

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  7. बहुत सुंदर और मन को एकाग्र करने वाली प्रस्तुति ।

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  8. जब अंतस अनंत सागर में, चित्तवायु शांत हो जाती|
    जीव वणिक शरीर नौका है, क्षय अभाग्यवस हो जाती||
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय श्री कैलाश शर्मा जी !!

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