Tuesday, 20 October 2015

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (चौदहवीं कड़ी)

                                        पंचम अध्याय (५.१-५.४)
                                            (with English connotation)
अष्टावक्र कहते हैं :
Ashtavakra says :

शुद्ध स्वरुप, न सम्बन्ध किसी से, त्याग चाहते करना क्या तुम|
अहंकार देह का तज कर, अपने स्वरुप से तादात्म्य करो तुम||(५.१)

You are pure and not attached to anything, then
what is there to renounce for you. Forgetting your
connection with unreal world, be one with your Self.(5.1)

उत्पन्न बुलबुले ज्यों सागर से, वैसे ही संसार उदित है तुझसे|
मन लय जब हो जाता आत्मा से, सर्व विश्व लय होता तुझसे||(५.२)

As the bubbles arise in the sea, similarly this world
originates from your Self. Knowing this, you
become one with your Self.(5.2)

शुद्ध रूप तुम में इस जग का, सर्प रज्जु सम अस्तित्व न कोई|
एकाकार हो तुम स्व-आत्मा से, जग का है अस्तित्व न कोई||(५.३)

This world visible to your eyes is un-real and
insubstantial. You are pure and this world does not
exist in you, like the snake imagined in the rope.
Knowing this, you be one with your Self.(5.3)

पूर्ण व सम सुख दुःख में जानो, जीवन मृत्यु में भी सम हो|
आशा और निराशा में हो सम, एकाकार आत्म से तुम हो||(५.४)

Equal in pleasure and pain, equal in life and death,
and equal in hope and disappointment, you are
complete and, therefore, be one with Self.(5.4)


                           पंचम अध्याय समाप्त 

                                              ....क्रमशः

....©कैलाश शर्मा

11 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (21-10-2015) को "आगमन और प्रस्थान की परम्परा" (चर्चा अंक-2136) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी साधना प्रणम्य है, चरैवेति - चरैवेति .................................................

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  3. आपकी साधना प्रणम्य है, चरैवेति - चरैवेति .................................................

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  4. आपकी साधना प्रणम्य है, चरैवेति - चरैवेति .................................................

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  5. अति सुन्दर अनुवाद।

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  6. अति सुन्दर अनुवाद।

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  7. This comment has been removed by the author.

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  8. पूर्ण व सम सुख दुःख में जानो, जीवन मृत्यु में भी सम हो|
    आशा और निराशा में हो सम, एकाकार आत्म से तुम हो
    सुन्दर , ज्ञानपरक शब्द आदरणीय शर्मा जी !!

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