Tuesday, 24 November 2015

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (अठारहवीं कड़ी)

                                        नवम अध्याय (९.१-९.४)
                                            (with English connotation)
अष्टावक्र कहते हैं :
Ashtavakra says :

क्या करना है उचित या वर्जित, शांत हुए कब द्वंद्व हैं किसके|
त्यागवान, विरक्त बन जाओ, संशय रहित ज्ञान यह करके||(९.१)

The confusion between what should be done or
should not be done, has never been satisfied.
Knowing this, be indifferent or ascetic.(9.1)

देख चेष्टाएँ लोगों की जग में, विरले धन्य पुरुष वह होते|
ज्ञान, भोग और जीने की इच्छा, इन सबसे हैं मुक्त वे होते||(९.२)

O son! Rare and blessed are those, who observing
the useless efforts of the people to satisfy their lust
for life, luxuries and knowledge, are free from these.(9.2)

यह अनित्य व सारहीन है, दूषित तीनों तापों से यह मानो|
निंदनीय व त्याग योग्य है, शांति है मिलती जब यह जानो||(९.३)

All this is temporary and contaminated by three
types of pain. Knowing that it is without essence,
ignoble and unacceptable, one attains peace.(9.3)

कौन है ऐसा समय उम्र या, मनुज न जब संशय में रहता|
विस्मृत करता जो यह संशय, वह सिद्धि को प्राप्त है करता||(९.४)

When was that time or age, when man did not
have any doubt or confusion. So renouncing your
doubts, attain happiness and peace.(9.4)

                                             ....क्रमशः

....©कैलाश शर्मा 

7 comments:

  1. True and motivated line..
    Nice sir

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  3. अति सुन्दर अनुवाद सर।बहुत खूब।

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  4. यह अनित्य व सारहीन है, दूषित तीनों तापों से यह मानो|
    निंदनीय व त्याग योग्य है, शांति है मिलती जब यह जानो
    बहुत ही सुन्दर और ज्ञानपरक !!

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