Wednesday, 13 January 2016

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (चौवीसवीं कड़ी)

                                   बारहवां  अध्याय (१२.१-१२.४)
                                            (with English connotation)
राजा जनक कहते हैं :
King Janak says :

मैं निरपेक्ष हूँ तन के कर्मों से, फिर वाणी से निरपेक्ष हुआ हूँ|
अब चिंता से निरपेक्ष है होकर, मैं स्थिति अपने रुप हुआ हूँ||(१२.१)

I became indifferent to all activities performed by
body and thereafter became indifferent to all the
activities of speech. Now being indifferent to all
the worries, I am peacefully established in Self.(12.1)

मैं अनासक्त हूँ सब विषयों से, आत्म दृष्टि का विषय न होता|   
मैं निश्छल एकाग्र ह्रदय से, अपने स्वरुप में बस स्थित होता||(१२.२)

I am unattached to all the subjects of sound and
senses and I know that the Self is not an object of
sight. Therefore, with my focussed and undisturbed
mind, I am established in my Self.(12.2)

असत्य ज्ञान विक्षेप है करता, उसको दूर समाधि है करता|
यह स्वाभाविक नियम मान कर, अपने रूप में स्थिर रहता||(१२.३)

Being distracted by wrong perceptions, one
strives for mental stillness. Knowing this as
natural pattern, I am established in my Self.(12.3)

त्याग ग्रहण से मैं विहीन हो, सुख दुःख से मैं मुक्त हूँ रहता|
अब मैं जैसा हूँ वैसा रह कर, अपने स्वरुप में स्थिर रहता||(१२.४)

Renouncing the feelings of rejection and acceptance,
I am liberated from pleasure and pain. Therefore,
staying as I am, I am established in Self.(12.4)

                                         ...क्रमशः

....©कैलाश शर्मा  

6 comments:

  1. लाजवाब अनुवाद सर। बहुत खूब।

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  2. अनुपम प्रयास ...सादर आभार

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  3. बहुत सुंदर अध्‍यात्‍मिक पोस्‍ट की प्रस्‍तुति।

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  4. त्याग ग्रहण से मैं विहीन हो, सुख दुःख से मैं मुक्त हूँ रहता|
    अब मैं जैसा हूँ वैसा रह कर, अपने स्वरुप में स्थिर रहता|
    निरपेक्ष होना जितना आसान लगता है सच में उतना होता नही ! सुंदर भावार्थ आदरणीय शर्मा जी

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