Saturday, 23 January 2016

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (पच्चीसवीं कड़ी)

                 बारहवां अध्याय (१२.५-१२.८)
                                            (with English connotation)
आश्रम अनाश्रम, धर्म नियम से, अपने को मैं रहित मानता|
इन सब का परिणाम देख कर, अपने स्वरुप में स्वयं धारता||(१२.५)

When I look at the various stages of life and
observe the rules accepted and prohibited by
mind, I stay as I am and I am established in Self.(12.5)

अज्ञान जनित अनुष्ठान कर्मों से, अपने को मैं मुक्त जानकर|
अपने स्वरुप में स्थित रहता, तत्व का सम्यक रूप जानकर||(१२.६)

Being aware that the performance of actions and
rituals is due to ignorance, I remain liberated from
the same. Knowing and recognising the truth
properly, I remain as I am and established in Self.(12.6)

करते हैं चिंतन अचिंत्य का, लेकिन चिंता से ग्रसित है रहता|
चिंतन भाव से मुक्त है हो कर, अपने स्वरुप में स्थित रहता||(१२.७)

While thinking about the unthinkable, we in fact
remain engrossed in thought only. Therefore, by
renouncing that thought, I remain established in Self.(12.7)

जो ज्ञानी आचरण यह करता, पूर्ण रूप वह मुक्त है होता|
जिसका ऐसा स्वभाव है होता, पूर्ण रूप वह मुक्त है होता||(१२.८)

One who behaves and acts thus is completely
liberated. One, who is of such nature, is fully
liberated.(12.8)


                **बारहवाँ अध्याय समाप्त**

                                             ...क्रमशः

....©कैलाश शर्मा   

8 comments:

  1. I am blessed to know such words with simple translation.
    Great work.

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  3. अद्वैत की सुंदर धार..

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  4. करते हैं चिंतन अचिंत्य का, लेकिन चिंता से ग्रसित है रहता|
    चिंतन भाव से मुक्त है हो कर, अपने स्वरुप में स्थित रहता
    बहुत सुंदर आध्यात्मिक प्रस्तुति !!

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